Tuesday, 31 January 2017

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 28

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास


* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 92

21 जून, 1576 ई.

"हल्दीघाटी का युद्ध"


"मेहतर खां का षडयन्त्र"

> भागती मुगल फौज को रोकने के लिए मेहतर खान ने ढोल पीटकर अफवाह फैलाई कि "शहंशाह खुद यहां आ रहे हैं"

तब कहीं जाकर मुगल फौज ने भागना बन्द किया और भागने वाले शाही सिपहसालार फिर से लौटकर आ गए

> इतने में चन्दावल में तैनात फौज माधोसिंह कछवाहा और मेहतर खां के नेतृत्व में आगे बढी

"युद्ध के समय कुंवर अमरसिंह की भूमिका"

> 17 वर्षीय कुंवर अमरसिंह ने हल्दीघाटी युद्ध में भाग नहीं लिया, क्योंकि महाराणा प्रताप ने युद्ध से पहले रनिवास का उत्तरदायित्व कुंवर अमरसिंह को दिया था

> राणा पूंजा भील का रिश्तेदार रुपा नाम का एक भील युद्ध की शुरुआत में ही भाग निकला, जिसे कुंवर अमरसिंह ने प्रतिशोध स्वरुप उदयपुर के महलों में मार डाला

"पानरवा के भील सर्दार राणा पूंजा का योगदान"

> हल्दीघाटी युद्ध में 400 भीलों का नेतृत्व करने वाले राणा पूंजा भील ने बड़ी बहादुरी दिखाई

> राणा पूंजा के इस युद्ध में वीरगति पाने वाली बात सही नहीं है, क्योंकि वे इस युद्ध में जीवित रहे व बाद में छापामार युद्ध में भी महाराणा का साथ दिया | राणा पूंजा का देहान्त हल्दीघाटी युद्ध के 34 वर्ष बाद 1610 ई. में हुआ था |

भीलू राणा पूंजा
> वीरविनोद के लेखक कविराज श्यामलदास ने भीलों की उपेक्षा की है, उन्होंने अपने विशाल ग्रन्थ में भीलों पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी, जिसमें भी राणा पूंजा के भागने की बात लिखी, जो कि सही नहीं है

> अब्दुल कादिर बंदायूनी ने भीलों का कोई उल्लेख नहीं किया, क्योंकि ये 400 भील मेवाड़ी फौज में सबसे पीछे चन्दावल में खड़े थे

> युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप ने भीलों की एक सैनिक टुकड़ी मुगल सेना की छावनी में भेजी | सभी मुगल युद्धभूमि में थे | छावनी में कुछ मुगल सैनिक व रसद का सामान था | भीलों ने छावनी पर हमला कर बचे खुचे मुगलों को मारकर रसद का सारा सामान लूट लिया |

(इस लूट के बाद मुगल फौज को खाने पीने की जो तकलीफ हुई, उसका हाल मौके पर लिखा जाएगा)

"पाली के मानसिंह सोनगरा का बलिदान"

पाली के मानसिंह सोनगरा चौहान

महाराणा प्रताप के ज्येष्ठ मामा मानसिंह सोनगरा बायीं ओर खड़े थे | वे मुगल पक्ष के दायीं ओर खड़े सैयदों से भिड़ गए और उनसे लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए |

"देलवाड़ा के मानसिंह झाला का बलिदान"

देलवाड़ा के मानसिंह झाला

देलवाड़ा के झाला मानसिंह भी सैयदों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए

* अगले भाग में महाराणा प्रताप द्वारा बहलोल खां वध के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 27

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास


* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 91

21 जून, 1576 ई.

"हल्दीघाटी का युद्ध"


* हाकीम खां सूर के प्रारम्भिक हमले की सफलता के बाद महाराणा प्रताप की फौजी टुकड़ी ने मुगल फौज पर हमला किया

* महाराणा प्रताप ने चेतक पर सवार होकर अपनी फौज में घूम-घूमकर अपने ओजस्वी स्वरों में कहा "चित्तौड़ के साका में केसरिया करने वाले वीरों और जौहर करने वाली वीरांगनाओं की सौगन्ध हे तुम्हें, ऐसा आक्रमण करो कि तुर्कों की आने वाली नस्लें हल्दीघाटी को याद कर कांपती नज़र आए.... हर-हर महादेव"


"काजी खां पर हमला"

महाराणा प्रताप का मुकाबला काजी खां की फौजी टुकड़ी से हुआ | काजी खां पहले तो बहादुरी दिखाकर खड़ा रहा, पर एक अंगूठा कटते ही भाग निकला |

"शैखजादों पर हमला"

महाराणा प्रताप ने सीकरी के शैखजादों की फौजी टुकड़ी पर हमला किया

शैखजादों समेत उनका मुखिया शैख मंसूर भी भागने लगा, तभी महाराणा प्रताप ने तलवार म्यान में रखकर धनुष हाथ में लिया और तीर चलाया | ये तीर शैख मंसूर के कूल्हे पर लगा |

काजी खां और शैखजादे 5-6 कोस तक भागते रहे | महाराणा प्रताप की सैनिक टुकड़ी ने उनका लगातार पीछा किया | जब वे दोनों एक नाले के पास आकर रुके, तो उनका सामना एक और मेवाड़ी सैनिक टुकड़ी से हो गया |

"गाज़ी खां पर हमला"

महाराणा प्रताप की सैनिक टुकड़ी का मुकाबला गाज़ी खां बदख्शी की सैनिक टुकड़ी से हुआ

महाराणा प्रताप के हमले से गाज़ी खां बदख्शी को भागना पड़ा

"आसफ़ खां पर हमला"
महाराणा प्रताप व रामशाह तोमर की टुकड़ियों ने मिलकर मीर बख्शी आसफ खां की फौजी टुकड़ी पर हमला किया

आसफ खां व मुगल लेखक अब्दुल कादिर बंदायूनी भागकर मुगल फौज के दायीं तरफ खड़े सैयदों के पीछे छिप गए |

"मानसिंह पर हमला"

महाराणा प्रताप और रामशाह तोमर का सामना मानसिंह के नेतृत्व वाली कछवाहों की सैनिक टुकड़ी से हुआ

इस समय मानसिंह ने पहले तो हाथी के महावत की जगह बैठकर बड़ी बहादुरी दिखाई, लेकिन तोमर वंश के सामने मानसिंह को पीठ दिखानी पड़ी

महाराणा प्रताप की नजर मानसिंह पर पडती, तब तक वह सभी कछवाहों समेत सैयदों के पीछे जा छिपा

* अकबर के दरबारी कवि दुरसा आढा लिखते हैं

"पातल घड पतसाह री,
ऐम विधू सी आण |
जाण चढी कर बंदरां,
पोथी वेद पुराण ||"


अर्थात्

"महाराणा प्रताप ने आते ही मुगल फौज का इस तरह विध्वंस कर दिया, मानो कोई वेद पुराण की पोथी बन्दरों के हाथ लग गई हो"

* मेरे द्वारा ऊपर लिखा वर्णन पक्षपात भरा ना लगे, इसलिए नीचे युद्ध में मौजूद मुगल लेखक अब्दुल कादिर बंदायूनी द्वारा लिखा गया वर्णन दिया जाता है :-

"बारहा के सैयदों ने रुस्तम जैसी बहादुरी दिखाई | दोनों तरफ से कई बहादुर मारे गए | राणा कीका (राणा प्रताप) की फौज की दूसरी टुकड़ी, जिसकी कमान खुद राणा कीका ने सम्भाल रखी थी, घाटी से निकलकर घाटी के मुहाने पर खड़े काजी खां की फौजी टुकड़ी पर हमला कर दिया | राणा काजी खां की फौज में तबाही मचाता हुआ फौजी टुकड़ी के बीच तक पहुंच गया | राणा के हमले से सीकरी के शैखज़ादे भाग निकले | शैख मंसूर के पिछवाड़े एेसा सख्त तीर लगा कि ये घाव बड़े दिनों तक रहा | काजी खां एक मुल्ला होने के बावजूद बड़ी बहादुरी से टिका रहा, पर उसके दाहिने हाथ का अंगूठा कट जाने के बाद वह ये कहता हुआ भाग निकला कि 'जब दुश्मन का हमला सहने लायक न हो तब वहां से भाग जाना पैगम्बर की दी हुई तालीम है' | उधर हाकिम खां के हमले से जो फौज पहले भागी थी, वह बनास नदी पार कर भागती ही रही | राणा और रामशाह तोमर के हमले से मानसिंह के साथी राजपूतों ने भागना शुरु किया, तो आसफ खां की कमान वाली फौजी टुकड़ी भी भाग निकली और ये सब भागकर सैयदों के पीछे छिप गए | अगर इस वक्त बहादुर सैयद न होते तो हमारी फौज की बड़ी बदनामी वाली हार होती | इस वक्त मेहतर खां, जो कि चन्दावल में था, निकलकर बाहर आया और ढोल पीटकर फौज को जमाने की कोशिश की"

* अगले भाग में मेहतर खां द्वारा पीछे खड़ी मुगल फौज को आगे लाकर नतीजा बदलने, महाराणा के मामा मानसिंह सोनगरा के बलिदान व भीलों की तीन टुकड़ियों के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 26

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास

पठान हाकिम खां सूर

* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 90

21 जून, 1576 ई.

"हल्दीघाटी का युद्ध"

* ये युद्ध सुबह लगभग 9-10 बजे से दोपहर 2-3 बजे तक 5 घन्टे तक चला

मानसिंह के फौज जमाने के 3 घण्टे बाद हल्दीघाटी के मुहाने से एक हाथी मेवाड़ का झण्डा लहराता हुआ बाहर निकला और हाथी के पीछे हरावल की कमान सम्भाले हाकिम खां सूर थे | फिर महाराणा प्रताप ने युद्धभूमि में प्रवेश किया |

* महाराणा प्रताप की सेना में भील, राजपूत, लुहार, ब्रामण, अफगान आदि थे

(हालांकि लुहार जाति के लोगों का काम महाराणा प्रताप व मेवाड़ी सेना के लिए हथियार बनाना था, फिर भी कुछ लुहारों ने युद्ध में भाग लिया | ये जाति आज भी घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करती है)

* अबुल फजल लिखता है "मेवाड़ी फौज मैदान में जंग के मुताबिक सही नहीं जमाई गई थी, पर राणा ने गज़ब की तेजी दिखाते हुए अपनी फौज को जंग के मुताबिक जमा दी | सर झुकाने या जान देने का बाज़ार खुल गया | यहाँ जान सस्ती और इज्जत महंगी थी"

"हाकिम खां सूर और सैयद हाशिम के बीच हरावल की लड़ाई"

> मेवाड़ी फौज की हरावल में हाकिम खां सूर के नेतृत्व में रावत कृष्णदास चुण्डावत, ठाकुर भीमसिंह डोडिया, रावत सांगा चुण्डावत, ठाकुर रामदास राठौड़ थे

> महाराणा प्रताप ने सबसे पहले मुगल फौज के हरावल दस्ते पर हमला करने के लिए हाकिम खां सूर को फौजी टुकड़ी समेत आगे भेजा

> पठान हाकिम खां सूर ने अपनी फौजी टुकड़ी को आक्रमण का आदेश देते वक्त कहा "आज देखता हूं दुश्मन फौज का कौनसा सिपाही हाकिम खां के हाथ से उसकी तलवार को अलग करता है, खुदा कसम आज इस पठान की तलवार मरने पर भी हाथ से नहीं छूटेगी"

> अबुल फजल लिखता है "दो खूनी समन्दरों की भिड़न्त ने सबको हैरान कर दिया | ज़मीन लाल रंग की लहरों से सन गई"

> मेवाड़ की तरफ से हकीम खां सूर मुगल फौज की हरावल से भिड़ गए

मुगल फौज की हरावल का नेतृत्व करने वाला सैयद हाशिम घोड़े से गिर गया | सैयद राजू ने उसे फिर घोड़े पर बिठाया |

> युद्ध में भाग लेने वाला मुगल लेखक अब्दुल कादिर बंदायूनी लिखता है

"हाकीम खां सूर नामी अफगान ने पहाड़ों से निकलकर हमारी हरावल पर हमला किया | उसके हमले से शाही फौज की हरावल में गड़बड़ी मच गई और हमारी हरावल पूरी तरह पस्त होकर भाग निकली | शाही फौज की हरावल ने 5-6 कोस तक पीछे मुड़कर भी नहीं देखा, पता नहीं मौत कहाँ से बरस पड़े | शाही फौज के बाईं तरफ तैनात राजा लूणकरण कछवाहा अपने साथी राजपूतों समेत समेत भेड़ों के झुण्ड की तरह भागकर हरावल के बीच में से निकलकर शाही फौज के दाहिनी तरफ खड़े बहादुर सैयदों के पीछे जाकर छिप गया"

"बदनोर के ठाकुर रामदास राठौड़ का बलिदान"

मुगल फौज की हरावल में केवल जगन्नाथ कछवाहा ही नहीं भागा था

वीर जयमल राठौड़ के पुत्र ठाकुर रामदास राठौड़ जगन्नाथ कछवाहा के साथ मुकाबले में वीरगति को प्राप्त हुए

ठाकुर रामदास राठौड़

जगन्नाथ कछवाहा गम्भीर रुप से घायल हुआ

अबुल फजल लिखता है "जगन्नाथ कछवाहा तकरीबन मरने ही वाला था कि मानसिंह ने आगे बढ़कर उसे बचाया और उसे पीछे ले गया"

"सरदारगढ़ के ठाकुर भीमसिंह डोडिया का बलिदान"

मानसिंह जब जगन्नाथ कछवाहा को बचाने आगे आया तब उसका मुकाबला ठाकुर भीमसिंह डोडिया से हुआ


भीमसिंह डोडिया ने प्रतिज्ञा की थी की "मानसिंह जिस हाथी पर बैठकर आएगा, उसी पर भाला मारुंगा"

भीमसिंह डोडिया ने हाथी पर भाला मारा, पर इस मुकाबले में वे वीरगति को प्राप्त हुए

* अगले भाग में हाकिम खां सूर के हमले की सफलता के बाद महाराणा प्रताप के नेतृत्व वाली मेवाड़ी फौज की दूसरी टुकड़ी के भीषण आक्रमण के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 25

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास


* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 89

21 जून, 1576 ई.

"हल्दीघाटी का युद्ध"

"मानसिंह कछवाहा के नेतृत्व में युद्ध में भाग लेने वाले सिपहसालार"

> अली आसफ खां :- इसे मीर बख्शी बनाया गया

> अब्दुल कादिर बंदायूनी :- ये मुगल लेखक था

> मेहतर खां :- ये चन्दावल का प्रमुख था | मानसिंह ने मेहतर खां के नेतृत्व में पीछे एक और फौज तैयार रखी थी, ताकि जरुरत पड़ने पर काम आ सके |

> काजी खां

> महाबली खां

> मुजाहिद बेग

> कमाल खां

> पंजु

> शैख मंसूर :- ये शैख इब्राहिम चिश्ती का दामाद था | इसकी कमान में सीकरी के शैखजादे थे |

> बहलोल खां :- ये उजबेक था

> खंजारी तुर्क

> सैयद राजू

> सैयद अहमद खां

> सैयद हाशिम खां :- ये हरावल का नेतृत्व कर्ता था

> हुसैन खां :- ये हाथियों का दारोगा था

> राजा लूणकरण :- ये कछवाहों की शेखावत शाखा के मूलपुरुष शैखा का प्रपौत्र था | अकबर ने लूणकरण को 'रायरायां' का खिताब भी दिया था |

> गाजी खां बदख्शी

> ख्वाजा मुहम्मद रफी बदख्शी

> अली मुराद उजबेक

> ख्वाजा गयासुद्दीन अली

> शाह गाजी खां तबरेजी

> शियाबुद्दीन गुरोह

> पायन्दा कज्ज़ाक

> इब्राहिम चिश्ती

> जगन्नाथ कछवाहा :- ये मानसिंह का काका था

> माधोसिंह कछवाहा :- ये मानसिंह का भाई था

> राव खंगार कछवाहा :- ये आमेर के राजा भारमल के भाई जगमाल का बेटा व मानसिंह का काका था | ये कछवाहों की खंगारोत शाखा का मूलपुरुष था |

> नाथा कछवाहा :- ये आमेर के राजा भारमल के भाई गोपाल सिंह का बेटा था | ये कछवाहों की नाथावत शाखा का मूलपुरुष था | इस पर नाथावंशप्रकाश नाम का ग्रन्थ लिखा जा चुका है | नाथा कछवाहा चित्तौड़ विध्वंस (1568 ई.) के समय अकबर के साथ था |

> मनोहरदास कछवाहा :- ये नाथा कछवाहा का बेटा था

"फौजी जमावट"

* मुगल फौज की हरावल -

सबसे आगे सैयद हाशिम अपने 80 सबसे मजबूत सिपाहियों के साथ था

उसके साथ हरावल में राजा जगन्नाथ कछवाहा, मोहम्मद रफी बदख्शी, ख्वाजा गयासुद्दीन अली, आसफ खां आदि थे | मुगल लेखक अब्दुल कादिर बंदायूनी भी हरावल के खास सैन्य में था |

* मेवाड़ी फौज की हरावल -

सबसे आगे हाकिम खां सूर ने हरावल का नेतृत्व किया

इनके साथ हरावल में सलूम्बर के रावत कृष्णदास चुण्डावत, देवगढ़ के रावत सांगा चुण्डावत, सरदारगढ़ के ठाकुर भीमसिंह डोडिया, बदनोर के रामदास राठौड़ भी थे

* मुगल फौज का दायां पक्ष व मेवाड़ी फौज का बायां पक्ष :- मुगल फौज के एक तरफ सैयद अहमद व बारहा के भाई थे, जिनके सामने मेवाड़ी सेना में बायीं तरफ तीनों मानसिंह जी (बड़ी सादड़ी के झाला मान अपने 150 सैनिकों के साथ, देलवाड़ा के मानसिंह झाला व महाराणा के मामा जालौर के मानसिंह सोनगरा) थे

* मुगल फौज का बायां पक्ष व मेवाड़ी फौज का दायां पक्ष :-  मुगल फौज के दूसरी तरफ गाजी खां बदख्शी, शैखजादा, काजी खां, राजा लूणकरण थे

(इन सभी की अपनी-अपनी फौजी टुकड़ी थी, जिनमें हल्दीघाटी मुहाने पर काजी खां की फौजी टुकड़ी तैनात थी)

इनके सामने मेवाड़ी सेना में दायीं तरफ राजा रामशाह तोमर अपने पुत्रों व 300 तोमर साथियों के साथ थे |

* मुगल फौज का मध्य भाग :- मुगल फौज के बीचों बीच मानसिंह कछवाहों की भारी जमात के साथ था | मानसिंह मर्दाना नाम के हाथी पर सवार था | मानसिंह के ठीक आगे बहलोल खां नामी उजबेक तैनात था |

* मेवाड़ी फौज का मध्य भाग :- मेवाड़ी सेना के बीचों बीच महाराणा प्रताप थे | महाराणा प्रताप के साथ भामाशाह कावडिया, ताराचन्द कावडिया, प्रताप सिंह तोमर आदि थे | प्रताप सिंह तोमर शुरुआत में घोड़े पर सवार थे व इस युद्ध में हाथियों के दारोगा थे, जो कि युद्ध के आखिरी वक्त में प्रसिद्ध रामप्रसाद नामी हाथी पर सवार हुए थे |

* चन्दावल :-

मुगल फौज में सबसे पीछे चन्दावल में माधोसिंह कछवाहा, मेहतर खां वगैरह थे

मेवाड़ी सेना में सबसे पीछे राणा पूंजा भील के नेतृत्व में पुरोहित गोपीनाथ, महता रत्नचन्द, पुरोहित जगन्नाथ, महासहानी जगन्नाथ, जैसा बारहठ आदि थे

* मुगल फौज में सबसे मजबूत टुकड़ी सैयद अहमद व बारहा के भाईयों की थी और मेवाड़ी फौज में सबसे मजबूत टुकड़ी तोमर वंश की थी, जो आखिर तक टिकी रही

> अगले भाग में हाकिम खां सूर के नेतृत्व में हरावल की लड़ाई, ठाकुर भीमसिंह डोडिया व रामदास राठौड़ के बलिदान के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 24

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास


* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 88

21 जून, 1576 ई.

"हल्दीघाटी का युद्ध"

"हल्दीघाटी युद्ध में सैनिकों की संख्या"

अलग-अलग इतिहासकारों ने सेना की संख्या भी अलग-अलग बताई है -

> कर्नल जेम्स टॉड व ख्यातों के अनुसार :- 80,000 मुगल फौज व 22,000 मेवाड़ी फौज

{कर्नल जेम्स टॉड व ख्यातों का इतिहास अक्सर बहुत बढ़ा-चढ़ाकर लिखा गया है | इसका पता इसी बात से चल सकता है कि कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध में मानसिंह की जगह सलीम (जहांगीर) द्वारा मुगल फौज का नेतृत्व करने की बात लिखी है, जबकि सलीम इस वक्त 7 वर्ष का था | 1568 ई. में चित्तौड़ के विध्वंस में मेवाड़ के लगभग सभी वीर वीरगति को प्राप्त हो चुके थे, तो महाराणा प्रताप मात्र 8 वर्षों में 22000 की फौज नहीं बना सकते थे | इसका एक और तर्क है कि जब अकबर ने स्वयं अपने नेतृत्व में चित्तौड़ जैसे सुदृढ़ दुर्ग पर चढाई कि तब उसकी फौज 60,000 थी, तो वह मानसिंह को 80,000 की फौज एक आमने-सामने लड़े जाने वाले युद्ध के लिए नहीं दे सकता था}

> मुहणौत नैणसी के अनुसार - 40000 मुगल फौज व 10000 मेवाड़ी फौज

> अब्दुल कादिर बंदायूनी, अबुल फजल के अतिरिक्त वर्तमान में बहुत से इतिहासकारों के अनुसार :- 5000 मुगल फौज व 3000 मेवाड़ी फौज

> प्रसिद्ध इतिहासकार यदुनाथ सरकार के अनुसार -

3000 मेवाड़ी फौज व 10000 मुगल फौज

"निष्कर्ष"

मुगलों की तरफ से हल्दीघाटी युद्ध में मौजूद अब्दुल कादिर बंदायूनी के बताए गए आँकड़ों के अनुसार युद्ध में 5000 सवार (मुगल + कछवाहा राजपूत) व 3000 मेवाड़ी सवार थे

बंदायूनी की ये बात सत्य है, लेकिन मुगल इतिहासकार अक्सर सिर्फ घुड़सवारों की ही गिनती लिखते थे, पैदल फौज की नहीं | बंदायूनी ने ये आँकड़े बताते वक्त साफ लिखा है कि 5000 सवार हमारे साथ थे |

इसके अतिरिक्त मुगलों ने आँकड़े छुपाने की कोशिश की है, जैसे अबुल फजल ने लिखा है "जंग में मुगल फौज की हार करीब थी कि तभी मेहतर खां पीछे खड़ी मुगल फौज को आगे ले आया और नतीजे बदल दिए"

> इस तरह ओझा जी के बताए अनुसार मेवाड़ी फौज के सही आँकड़े इस तरह हैं :-

3000 घुड़सवार, 2000 पैदल फौज व 100 नक्कारे बजाने वाले व सामान ढोने वाले

(5000 की इस मेवाड़ी फौज में 400 भील, 800 अफगान, 3000 राजपूत व शेष ब्राह्मण व चारण थे)

> मुगल फौज के आँकड़े इस तरह हैं :-

10,000 घुड़सवार (मुगल + कछवाहा)
10,000 पैदल फौज (मुगल + कछवाहा)

इस तरह मेवाड़ी फौज 5,000 व मुगल फौज लगभग 20,000 थी, पर इन आँकड़ों को देखकर ये नहीं कहा जा सकता कि मुगल फौज मेवाड़ी फौज की मात्र चार गुना थी | इस फौजी ताकत के अलावा हथियार-हाथियों की संख्या नीचे लिखी जाती है :-

> बन्दूकें :- मेवाड़ की तरफ से बन्दूकों को उपयोग नहीं हुआ | मेवाड़ी फौज में 800 अफगान थे, लेकिन इन्होंने भी बन्दूकों का उपयोग नहीं किया, जबकि मुगलों ने सैकड़ों बन्दूकों का उपयोग किया

> हाथी :- मेवाड़ की तरफ से रामप्रसाद, लूना समेत कुल 100 हाथी थे, जबकि मुगल फौज में हाथी सैंकड़ों की तादाद में थे और मुगल हाथी हथियारों से लैस थे, जिनकी सूंड में भी खांडे लगा रखे थे

> घोड़े :- मेवाड़ी फौज में 3,000 घोड़े थे, जिनमें से 300 घोड़े जोशी पूनो नाम के व्यक्ति के थे व शेष अरबी और गुजराती घोड़े थे, जबकि मुगल फौज में घोड़ों की संख्या 10,000 थी

> तोपें :- मेवाड़ की तरफ से तोपों का उपयोग नहीं हुआ, जबकि मुगलों ने मेवाड़ के खराब रास्तों की वजह से बड़ी तोपें ना लाकर उच्च तकनीक वाली छोटी तोपों का प्रयोग किया

> ऊँट :- मेवाड़ की तरफ से ऊँटों का उपयोग नहीं हुआ, जबकि मुगल लेखक मौलाना मुहम्मद हुसैन आजाद लिखता है "हल्दीघाटी की जंग में मुगल फौज में ऊँटों के रिसाले आँधी की तरह दौड़ रहे थे"

* अगले भाग में हल्दीघाटी युद्ध में भाग लेने वाले प्रमुख मुगल व कछवाहा सिपहसालारों के नाम व मेवाड़-मुगल फौजों की जमावट के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 23

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास

महाराणा प्रताप फौज समेत हल्दीघाटी दर्रे से गुजरते हुए

* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 87

1576 ई.


"हल्दीघाटी का युद्ध"

"महाराणा प्रताप द्वारा मानसिंह को जीवनदान"


> मानसिंह के नेतृत्व में मुगल फौज मांडलगढ़ से निकली और मोही गांव में पड़ाव डाला | मोही से निकलकर मोलेला गांव में पड़ाव डाला |

> महाराणा प्रताप सेना सहित गोगुन्दा से रवाना हुए

जहां-जहां से महाराणा प्रताप की कमान में मेवाड़ी फौज गुजरी, लोगों ने घरों से बाहर निकलकर इस सेना को प्रणाम किया

> महाराणा प्रताप ने खमनौर से 10 मील दक्षिण-पश्चिम में लोसिंग (ढाणा) गाँव में पड़ाव डाला

यहां एक घटना हुई कि मानसिंह इस बात से अनजान था कि महाराणा प्रताप की फौज का पड़ाव मोलेला गांव से महज़ 12 मील के फासिले पर है

मोलेला गांव से मानसिंह 1000 सवारों समेत शिकार के लिए निकला और महाराणा प्रताप की फौज के पड़ाव के बहुत नजदीक आ गया

महाराणा प्रताप ने पूरबिया दुरस परवतसिंहोत व सिसोदिये नेता भाखरोत को गुप्तचर के तौर पर मानसिंह का पता लगाने भेजा

इन गुप्तचरों ने महाराणा प्रताप को इस बात की सूचना दी

महाराणा प्रताप के पास मानसिंह को पराजित करने का सुनहरा अवसर था

सभी सामन्तों ने मानसिंह पर हमला करने का प्रस्ताव रखा

पर बड़ी सादड़ी के झाला मान/बींदा ने कहा कि हम मानसिंह को धोखे से नहीं हरा सकते

महाराणा प्रताप ने भी झाला मान की इस बात पर सहमति जताई

मानसिंह मोलेला चला गया और अगले दिन उसे पता चला कि उसे जीवनदान मिला है

21 जून, 1576 ई.

"दोनों फौजों का खमनौर पहुंचना"


> हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून को नहीं, 21 जून को लड़ा गया था

> आधी रात को मोलेला गांव से मानसिंह ने खमनौर की तरफ कूच किया और सूरज उगने से पहले खमनौर के मैदान में अपनी फौज को जंग के मुताबिक जमाना शुरु कर दिया

> लोसिंग से महाराणा प्रताप हल्दीघाटी पहुंचे

महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी दर्रे पर अपने 5000 सैनिकों को जमा किया

हल्दीघाटी दर्रे से एक बार में केवल 1-2 व्यक्ति ही जा सकते थे

हल्दीघाटी दर्रा

"हळदीघाटी हरोळ,
घमंड करण अरी घणा |
आरण करण अडोल,
पहोच्यो राण प्रतापसी ||"


> कुरान की आयत 25 में हल्दीघाटी युद्ध व महाराणा प्रताप के विरोध में लिखा है कि

"उनसे जंग करो, जो अल्लाह और कयामत के दिन में यकिन नहीं करते | जो कुछ अल्लाह और उसके पैगम्बर ने निषेध कर रखा है, उसका निषेध नहीं करते | उस रास्ते पर नहीं चलते, जो सच का रास्ता है और जो उन लोगों का है, जिन्हें कुरान दी गई है | तब तक उनसे जंग करो, जब तक वे तोहफे ना दें, पूरे झुका न दिए जाएँ, नेस्तनाबूद न कर दिए जाएँ"

"महाराणा प्रताप की बादशाह बाग पर विजय"

हल्दीघाटी युद्ध की शरुआत में मुगल फौज की एक टुकड़ी बादशाह बाग में जमा हुई

सूरज उगते ही बादशाह बाग पर महाराणा प्रताप ने आक्रमण कर मुगल फौजी टुकड़ी को खदेड़ा | मुगल फौजी टुकड़ी भागकर खमनौर में पहुंची, जहां कुल मुगल फौज जमा थी |

"मानसिंह की कूटनीति"

महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी में कुछ वक्त मानसिंह का इन्तजार किया, पर वह नहीं आया

मानसिंह जानता था कि हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप को पराजित नहीं किया जा सकता

मुगल खुले मैदानों में लड़ने के अभ्यस्त होते थे | साथ ही खुले मैदानों में तोपों का उपयोग आसान होता था |

मानसिंह खमनौर ही रुका, इसलिए महाराणा प्रताप ने ही खमनौर के खुले मैदान में युद्ध लड़ने का फैसला किया

महाराणा प्रताप हल्दीघाटी दर्रे से निकलकर खमनौर गाँव के पास की समतल भूमि (वर्तमान में रक्त तलाई) में जा पहुंचे

* कर्नल जेम्स टॉड लिखता है "अपने राणा का अनुसरण करते हुए सब वहीं पहुंच रहे थे, जहाँ युद्ध सबसे भयंकर होना था | वंश के वंश प्रचण्ड निर्भीकता के साथ आगे बढ़ रहे थे"

> अगले भाग में हल्दीघाटी युद्ध में दोनों पक्षों की सैन्य संख्या, हथियार, हाथी-घोड़ों की सही संख्या के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 22

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास

मेवाड़ के इतिहास का भाग - 86

"हल्दीघाटी का युद्ध"

1576 ई.

* अकबर ने अजमेर से मानसिंह को फौज समेत रवाना किया

मानसिंह मांडलगढ़ दुर्ग (भीलवाड़ा) पहुंचा

मांडलगढ़ में मानसिंह 2 माह (मध्य अप्रैल से मध्य जून) तक रुका

"हल्दीघाटी युद्ध से पूर्व मेवाड़ी सभा"

महाराणा प्रताप के बहनोई शालिवाहन तोमर सबसे पहले मानसिंह के नेतृत्व में आने वाली मुगल फौज के पड़ाव की खबर लेकर महाराणा प्रताप के पास पहुंचे

महाराणा प्रताप राजा रामशाह तोमर के घर पहुंचे और सभी सामन्तों को भी वहीं बुलाकर सलाह-मशवरा किया

इस सभा में बड़ी सादड़ी के झाला बींदा/मानसिंह, महाराणा के मामा जालौर के मानसिंह सोनगरा, देलवाड़ा के झाला मानसिंह, राव संग्रामसिंह, सरदारगढ़ के भीमसिंह डोडिया, बिजौलिया के डूंगरसिंह पंवार, शेरखान चौहान, सेढू महमूद खां, पत्ता चुण्डावत के पुत्र कल्याण सिंह, जालम राठौड़, नंदा प्रतिहार, नाथा चौहान, हरिदास चौहान, दुर्गादास, प्रयागदास भाखरोत, कूंपा के पुत्र जयमल, मंत्री भामाशाह आदि उपस्थित थे

राजा रामशाह तोमर ने प्रस्ताव रखा कि मुगलों से खुले में युद्ध लड़ना ठीक न रहेगा

सभी सामन्तों समेत महाराणा प्रताप ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि मुगल फौज का नेतृत्व मानसिंह कर रहा था

(यहां अकबर की रणनीति काम आई, कि मानसिंह को सेनापति बनाने के बाद महाराणा प्रताप को सामने आना ही होगा)

(इस सभा कि जानकारी 'राणा रासौ' ग्रन्थ से ली गई है)

"महाराणा प्रताप की मांडलगढ़ पर चढाई"

मानसिंह फौज समेत मांडलगढ़ पहुंच तो चुका था, पर उसने एक बार फिर महाराणा प्रताप को सन्धि के लिए मनाना उचित समझा

(बहुत से इतिहासकारों के अनुसार मानसिंह एक ही बार महाराणा प्रताप को सन्धि हेतु मनाने पहुंचा था, पर यहां कुछ प्रमाण रखे जाते हैं, जिससे साबित होता है कि मानसिंह 2 बार महाराणा प्रताप को मनाने गया था)

अबुल फजल लिखता है

"मानसिंह बादशाही फौज के साथ मांडलगढ़ पहुंचा | शहंशाह ने मानसिंह के लिए हुक्म भिजवाया कि वह (मानसिंह) कुछ वफादार लोगों के साथ जाए और राणा कीका (राणा प्रताप) को नींद से जगाकर शहंशाह के दरबार का रास्ता दिखा दे | नींद से जागने के इस मौके पर राणा ने बिना अक्लमन्दी से अपनी ज़िद और भी बढ़ा ली | उसने शहंशाह के भाग्य को नज़रअन्दाज कर दिया | राणा ने गुरुर में आकर बादशाही लश्कर का ख्याल न करके मानसिंह को अपना मातहत जमींदार समझते हुए मांडलगढ़ पर हमला करने का इरादा किया और वह फौज लेकर तबाही मचाने आगे चढ़ आया, पर उसके खैरख्वाहों ने उसे एेसा करने से रोका"

मानसिंह पर लिखे गए ग्रन्थ 'मानप्रकाश' में लिखा है

"मांडलगढ़ से निकलकर अग्नि के समान तेजस्वी राजा मानसिंह ने महाशक्तिशाली राणा प्रताप से कहा कि 'तुम्हे सर्वस्व देकर बादशाह की सेवा करनी है' | राजा मान की बात सुनकर राणा अत्यन्त क्रुद्ध हो गया और राजा मानसिंह को मारने के लिए मांडलगढ़ आ पहुंचा"

निष्कर्ष रुप में ये कहा जा सकता है कि मानसिंह महाराणा प्रताप को दोबारा सन्धि के लिए मनाना नहीं चाहता होगा, क्योंकि पिछली बार का अपमान वह भूला नहीं था | पर ये अकबर का हुक्म था, इसलिए वह जरुर महाराणा प्रताप को मनाने गया होगा | वहां मानसिंह ने महाराणा प्रताप को बातों-बातों में भड़का दिया, जिससे महाराणा प्रताप ने क्रोधवश मांडलगढ़ पर चढ़ाई करने का फैसला किया |

अकबरनामा व मानप्रकाश ग्रन्थ के अनुसार महाराणा प्रताप मांडलगढ़ तक पहुंच चुके थे या मांडलगढ़ के लिए निकल चुके थे, पर राणा रासौ ग्रन्थ के अनुसार महाराणा प्रताप ने मांडलगढ़ पर हमला करने का सिर्फ विचार किया था, चढाई नहीं |

यहां राणा रासौ की बात गलत साबित होती है, क्योंकि यदि महाराणा प्रताप ने सिर्फ विचार ही किया होता, तो ये बात अबुल फजल को पता न चलती |

महाराणा प्रताप ने चढाई की, पर सामन्तों द्वारा मनाने पर तत्काल हमला न करके कुछ समय बाद तैयारी से हमला करना बेहतर समझकर गोगुन्दा लौट गए

> अगले भाग में हल्दीघाटी युद्ध से पहले महाराणा प्रताप द्वारा मानसिंह को मिले जीवनदान व कुछ अन्य घटनाओं के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)