Saturday, 23 September 2017

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 89



* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 153

सितम्बर, 1588 ई.

"बांधण का ताम्रपत्र"


> यह ताम्रपत्र महाराणा प्रताप द्वारा जारी भामाशाह कावडिया द्वारा लिखित है

> आश्विन कृष्णा 7 संवत् 1645 को यह ताम्रपत्र प्रदान किया गया

> ताम्रपत्र के अनुसार महाराणा प्रताप ने आयस आणंदनाथ को सीदरी के गांव बांधण में 4 हल भूमि प्रदान की

24 अक्टूबर, 1588 ई.

"महाराणा प्रताप की जहांजपुर विजय"

> महाराणा प्रताप ने जहांजपुर पर हमला किया व विजयी हुए

> जहांजपुर में महाराणा के भाई जगमाल के वंशज रहा करते थे | साथ ही यहां मुगल चौकी भी थी, जो महाराणा द्वारा हटा दी गई |

"पडेर का ताम्रपत्र"

> यह ताम्रपत्र जहांजपुर विजय के उपलक्ष्य में महाराणा प्रताप द्वारा जारी व भामाशाह कावडिया द्वारा लिखित है

> यह ताम्रपत्र कार्तिक शुक्ला 15 संवत् 1645 को प्रदान किया गया

> महाराणा प्रताप ने जहांजपुर परगने के पडेर गांव में 11 हल भूमि तिवाड़ी (ब्राह्मण) सादुलनाथ, कानागोपाल को प्रदान की

(उस समय एक हल भूमि लगभग तीन बीघा के बराबर होती थी)

> यह गांव पहले महाराणा उदयसिंह जी द्वारा दान किया गया था, लेकिन इस जगह का पुनर्नवीकरण महाराणा प्रताप के समय हुआ

"अकबर द्वारा महाराणा के विरुद्ध संघर्ष विराम"

> चित्तौड़गढ़ व मांडलगढ़ के अलावा समस्त मेवाड़ पर महाराणा प्रताप ने अधिकार कर लिया

गौर से देखा जाए तो चित्तौड़गढ़ व मांडलगढ़ महाराणा उदयसिंह के समय ही मुगलों के हाथ लग चुके थे | महाराणा प्रताप के शासनकाल में जितना मुगलों ने छीना, उसे फिर से प्राप्त करने में महाराणा प्रताप सौ फीसदी सफल हुए |

> जिस समय अकबर के प्रकोप से बड़े-बड़े राजा बिना लड़े आत्मसमर्पण कर चुके थे, उस समय जंगलों में रहने वाले एक शख्स ने न सिर्फ समस्त मुगल साम्राज्य को चुनौती दी, बल्कि अपने से सौ गुना शक्तिशाली मुगल सल्तनत को इस तरह घुटनों पर झुका दिया कि महाराणा के जीते जी फिर कभी अकबर ने मेवाड़ पर हमला नहीं किया

अनगिनत युद्ध हारकर,
खुद अकबर ने किया विराम |
और कहते हैं कुछ अर्द्ध ज्ञानी,
हार गया राणा पर था बड़ा महान ||

> अकबर ने संघर्ष विराम कर दिया, लेकिन महाराणा प्रताप ने इस संघर्ष को जारी रखा और मेवाड़ के बाहर जो मुगल थाने थे, उनको लूटने का काम किया व मालवा, गुजरात, अजमेर के इलाकों में लूटमार की

* अगले भाग में महारानी अजबदे बाई के देहान्त, महाराणा प्रताप द्वारा सूरत की मुगल छावनियों में लूटमार व कुछ अन्य घटनाओं के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 88



* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 152

"भील जाति का सहयोग"

* एक बार महाराणा प्रताप के कुछ पुत्र शत्रुओं के पंजे में पहुंच गए, परन्तु कावा के स्वामिभक्त भीलों ने उनको बचा लिया

भील महाराणा प्रताप के बच्चों को टोकरों में ले गए व उनकी देखभाल की

जावर व चावण्ड के घने जंगल के वृक्षों पर लोहे के बड़े-बड़े कीले अब तक गढ़े हुए मिलते हैं | इन कीलों की बेतों के बड़े-बड़े टोकरे टांग कर उनमें महाराणा के बच्चों को छिपाकर भील महाराणा की सहायता करते थे |

पूंजा भील के नेतृत्व में भीलों ने महाराणा प्रताप का अन्त तक साथ दिया |

"जीत लिया भीलों का मन,
व्यक्तित्व पर ऐसा था राणा |
पूंजा भील था साथ खड़ा,
राणा ने कहा अब तू भी 'राणा' ||"


1586 ई.

* अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल का देहान्त हुआ |
बीरबल 8000 मुगलों समेत अफगानों द्वारा मारा गया |

* इसी वर्ष अकबर ने कश्मीर पर फतह पाई

1587 ई.

* इस वर्ष अकबर के पौत्र व जहांगीर के पुत्र खुसरो का जन्म हुआ

* इसी वर्ष महाराणा प्रताप के रिश्तेदार जसवन्त सोनगरा (महाराणा के मामा मानसिंह सोनगरा के पुत्र), जो कि मेवाड़ में ही रह रहे थे, उनको मारवाड़ के मोटा राजा उदयसिंह ने अपने पास बुलाया और 30 गाँवों की जागीर दी |

"महाराणा प्रताप का आमेर पर हमला"


* महाराणा प्रताप ने आमेर के जगन्नाथ कछवाहा, मानसिंह वगैरह को सबक सिखाने के लिए कुंवर अमरसिंह व भामाशाह को आमेर भेजा

कुंवर अमरसिंह व भामाशाह ने आमेर के समृद्ध नगर मालपुरा को लूटकर तहस-नहस कर दिया

मालपुरा के अतिरिक्त चाटसू व लालसोटि नगरों पर भी कुंवर अमरसिंह के आक्रमण की बात अमरसार ग्रन्थ में लिखी गई है

"गुजरात अभियान"


* कुंवर अमरसिंह ने गुजरात के किसी शाही प्रदेश पर हमला किया व 70 हजार का धन दण्डस्वरुप (लूट) वसूल किए

"मुगल थानों पर हमले"


* जगन्नाथ कछवाहा ने कश्मीर जाने से पहले मेवाड़ में कई जगह मुगल थाने तैनात कर दिये थे

महाराणा प्रताप ने सभी मुगल थानों पर हमले किए व विजयी हुए

1587-88 ई.

* इन्हीं दिनों में महाराणा प्रताप के समकालीन कवि हेमरतन सूरि ने महाराणा प्रताप द्वारा लगातार संघर्ष करने के बारे में लिखा

"प्रतपई दिन-दिन अधिक प्रताप"

* अगले भाग में महाराणा प्रताप द्वारा जारी किए गए पडेर व बांधण के ताम्रपत्रों के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 87



* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 151

1585 ई.

* सूरखण्ड का शिलालेख :-
इस वर्ष का एक शिलालेख अब तक उदयपुर के विक्टोरिया हॉल में मौजूद है, जिसका नाम "सूरखण्ड का शिलालेख" है | ये शिलालेख महाराणा प्रताप के देहान्त के बाद किसी ने महाराणा द्वारा जारी किया हुआ लिखकर इसे झूठा ही प्रसिद्ध कर दिया | सूरखण्ड के शिलालेख की भाषा भी महाराणा प्रताप के समय की नहीं लगती, इसलिए उस शिलालेख का वर्णन यहां नहीं किया जा रहा है |

* इसी वर्ष बूंदी के राव सुर्जन हाडा का देहान्त हुआ

1586 ई.

"बांसवाड़ा के उत्तराधिकार संघर्ष में महाराणा प्रताप द्वारा उग्रसेन का व अकबर द्वारा मानसिंह चौहान का पक्ष लेना"

> 1583 ई. में महाराणा प्रताप ने कूटनीति से ठाकुर मानसिंह चौहान से बांसवाड़े का आधा राज्य लेकर उग्रसेन को दिलवाया था, परन्तु आधा राज्य अब भी मानसिंह चौहान के हाथ में था जो कि बांसवाड़ा पर धोखे से अधिकार जमा कर बैठा था |

> मुहणौत नैणसी द्वारा लिखित एक घटना के अनुसार मारवाड़ के राव चन्द्रसेन के पुत्र आसकर्ण (महाराणा प्रताप के भाणजे) के देहान्त के बाद आसकर्ण की विधवा रानी का बांसवाड़ा के महलों में आना हुआ, तो मानसिंह ने उन पर कुदृष्टि डाली, जिससे उन्होंने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली |

> महाराणा प्रताप ने इस घटना से क्रोधित होकर डूंगरपुर रावल साहसमल के साथ मिलकर उग्रसेन को 1500 घुड़सवारों की फौजी मदद देकर मानसिंह चौहान पर हमला करने भेजा |

मानसिंह चौहान की फौज बुरी तरह पराजित हुई और खुद मानसिंह बांसवाड़ा के महलों की खिड़की से निकलकर भाग गया |

उग्रसेन के हमले से मानसिंह का सामन्त चावंडा भोजा सामरोत मारा गया व बांसवाड़ा पर उग्रसेन का अधिकार हुआ

उग्रसेन महाराणा प्रताप का सामन्त था, इसलिए बांसवाड़ा पर महाराणा प्रताप का पूर्णत: अधिकार हुआ

> अब मानसिंह चौहान ने मुगल बादशाह अकबर की शरण ली | अकबर जानता था कि अप्रत्यक्ष रुप से महाराणा प्रताप इस घटना से जुड़ चुके हैं, इसलिए उसने मानसिंह चौहान और मुगल सेनापति मिर्जा शाहरुख को मुगल फौज के साथ बांसवाड़े पर कब्जा करने भेजा |

> महाराणा प्रताप को पता चला, तो उन्होंने उग्रसेन व साहसमल के साथ मिलकर बादशाही मुल्क लूटना शुरु कर दिया | महाराणा मालवा की मुगल छावनियाँ लूटकर मेवाड़ पधारे |

मिर्जा शाहरुख व मानसिंह चौहान मालवा पहुंचे, जहां उग्रसेन नहीं मिले | फिर मुगल फौज बांसवाड़े की तरफ रवाना हुई |

> महाराणा प्रताप ने उग्रसेन को फौजी मदद देकर मिर्जा की फौज से लड़ने भेजा

> भीलवण नामक स्थान पर उग्रसेन व मानसिंह के बीच लड़ाई हुई, जिसमें मानसिंह चौहान व मुगल फौज पराजित हुई | इस लड़ाई में दोनों तरफ से कुल 400 सैनिक मारे गए |

> कुछ समय बाद उग्रसेन ने गांगा गौड़ को मानसिंह के डेरे में भेजा, जहां गांगा गौड़ ने मानसिंह का वध कर दिया |

* अगले भाग में महाराणा प्रताप द्वारा आमेर व जहांजपुर पर किए गए सफल आक्रमणों के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 86



* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 150

1585 ई.



* इसी वर्ष महाराणा प्रताप और अकबर ने अपनी-अपनी राजधानी बदली :-

* अकबर ने लाहौर को अपनी राजधानी बनाई

"चावण्ड"

* महाराणा प्रताप ने उदयपुर में स्थित चावण्ड को मेवाड़ की राजधानी बनाई
चावण्ड का प्रवेश द्वार

* महाराणा प्रताप अपने जीवन के अन्तिम 12 वर्षों तक चावण्ड में ही रहे

"ये अटल प्रताप प्रतिज्ञा थी,
जिसने रजपूती धर्म निभाया |
पत्थर को तोड़ पहाड़ों में,
मेवाड़ नया निर्माण किया ||"

चावण्ड स्थित महाराणा प्रताप की गुफा

* इसी वर्ष महाराणा प्रताप ने चावण्ड में छप्पन के राठौड़ों के विद्रोह को दबाया व उनके सरदार लूणा चावण्डिया राठौड़ को पराजित किया | इस कार्य में रावत कृष्णदास चुण्डावत ने भी महाराणा का साथ दिया |

अन्य राठौड़ जमींदार, जिन्होंने मेवाड़ में रहते हुए भी महाराणा प्रताप की अधीनता स्वीकार न की, उनका भी दमन किया गया

इस तरह महाराणा प्रताप ने छप्पन (56 इलाकों के समूह) पर भी अधिकार कर लिया

* महाराणा प्रताप ने चावण्ड में चामुण्डा माता के पुराने मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया
चावण्ड स्थित माँ चामुण्डा मन्दिर

* महाराणा प्रताप ने चावण्ड में 16 पनाहगाह बनवाए

इनमें महल, भवन, चतारों की ओवरी, मन्दिर आदि शामिल है

* चावण्ड के महलों के बारे में इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा लिखते हैं
चावण्ड महलों के अवशेष

"महलों के खण्डहर बतलाते हैं कि उनमें विलासिता या वैभव का कोई दिखावा नहीं रखा गया था | इनकी बनावट में ग्रामीण जीवन तथा सुरक्षा के साधनों को प्रधानता दी गई थी | जगह-जगह मोर्चों की सुविधाएँ, निकलकर बचने की व्यवस्था और सादगी पर अधिक बल दिया गया था | ये महल युद्धकालीन स्थापत्य कला के अनूठे उदाहरण हैं"

* महाराणा प्रताप ने चावण्ड में रहकर मेवाड़ के अपराधियों को उचित दण्ड देकर उनकी संख्या में कमी करते हुए मेवाड़ में शान्ति का वातावरण स्थापित किया

* इसी वर्ष नवाब अली खां ने मेवाड़ में लूटमार की

महाराणा प्रताप ने रावत कृष्णदास चुण्डावत को फौज देकर उसका दमन करने भेजा

रावत चुण्डावत ने नवाब अली खां को मारकर उसकी फौज को खदेड़ दिया

* महाराणा प्रताप ने पहाड़ी जमीन में पैदा हो सकने वाली फसलें (कुरी, सामा, जौ) उत्पादन पर जोर दिया

महाराणा ने कूणप जल विधि अपनाई व कृषि से सम्बन्धित एक ग्रन्थ लिखवाया

* महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा में विशाल समारोह का आयोजन किया | इसमें उनका साथ देने वाले वीरों को तथा वीरगति को प्राप्त हो चुके वीरों के उत्तराधिकारियों को पुरस्कार दिये |

महाराणा ने मेवाड़ के वीरान भागों को फिर से बसाने की घोषणा की | पीपली, ढोलन, सघाना, टीकड़ आदि गांव पूरी तरह तहस-नहस हो गए थे, जिन्हें फिर से बसाया गया |

किसानों को नई भूमि दी गई | शीघ्र ही मेवाड़ के वीरान पड़े खेत फसलों से लहलहाने लगे |

महाराणा ने व्यापार व उद्योगों को प्रोत्साहन दिया | मेवाड़ के लोग - स्त्रियां, बच्चे, वृद्ध सभी निर्भय होकर घूमने लगे |

महाराणा अमरसिंह के समय में लिखे गए एक ग्रन्थ 'अमरसार' में लिखा है कि

"महाराणा प्रताप ने अपने राज्य में इतना सुदृढ़ शासन स्थापित कर दिया, कि औरतों और बच्चों को भी किसी का भय नहीं रहा | महाराणा प्रताप के शासनकाल में पाश (डोरी) की विद्यमानता महिलाओं की अलकाओं में ही होती थी | चोरों को पकड़ने के लिए पाश (रस्सी) का प्रयोग नहीं होता था | जन साधारण का उचित और नैतिक आचरण सामान्य बात हो गई थी"

* अगले भाग में बांसवाड़ा के उत्तराधिकार संघर्ष में महाराणा प्रताप द्वारा उग्रसेन का व अकबर द्वारा मानसिंह चौहान का पक्ष लेने के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 85


मेवाड़ से भागती हुई मुगल फौज

* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 149

1585 ई.
"महाराणा प्रताप का विजय अभियान"


* महाराणा प्रताप गोडवाड़ से निकले और चावण्ड में तैनात मुगलों को मार भगा कर चावण्ड पर अधिकार किया

* महाराणा प्रताप ने दो सैनिक टुकड़ियां बनाई, जिसमें एक का नेतृत्व स्वयं महाराणा ने व दूसरी का नेतृत्व कुंवर अमरसिंह ने किया

"महाराणा प्रताप की उदयपुर विजय"

महाराणा प्रताप ने उदयपुर पर चढाई की

महाराणा के आने की खबर सुनते ही उदयपुर में तैनात मुगल फौज के हौंसले पस्त हो गए और ये फौज बिना लड़े ही भाग निकली

महाराणा प्रताप ने बिना खून खराबे के ही उदयपुर पर अधिकार कर लिया

* महाराणा प्रताप ओवरां गांव में पहुंचे

ओवरां में स्थित शाही थाने पर हमला किया व विजयी हुए

* ओवरां से महाराणा प्रताप जावर पहुंचे

जावर में सीसा व जस्ता की खदानें थी | आर्थिक रुप से समृद्ध होने के कारण इस इलाके पर अक्सर मुगलों की नज़र रहती थी |

महाराणा प्रताप ने जावर के शाही थाने पर हमला किया व विजयी हुए

* कुंवर अमरसिंह ने मोही, मदारिया, आमेट, देवगढ़ वगैरह शाही थानों पर हमले किए व विजयी हुए

* महाराणा प्रताप ने भीमगढ़ मुगल थाने पर हमला किया व विजयी हुए

* पिण्डवाड़ा स्थित शाही थाना 1576 ई. में अकबर ने आमेर के भगवानदास कछवाहा की मदद से लगाया था

महाराणा प्रताप का पिण्डवाड़ा शाही थाने पर हमला व विजय

* महाराणा प्रताप ने फिर से वागड़ पर हमला किया व विजयी हुए

ये वागड़ पर महाराणा की तीसरी विजय थी

(इससे पहले महाराणा प्रताप ने 1555 ई. व 1578 ई. में वागड़ पर विजय प्राप्त की थी)

* महाराणा प्रताप ने खेरवाड़ा, आसपुर व बिजौलिया पर भी विजय प्राप्त की

* कुंवर अमरसिंह तेज गति से एक ही दिन में 5 शाही थाने उठाते हुए चावण्ड में महाराणा प्रताप के पास हाजिर हुए

"तुर्कों की हर चौकी पर,
रजपूती शस्त्रों का वार हुआ |
फिर से मेवाड़ी धरती पर,
राणा प्रताप का अधिकार हुआ ||

* मेवाड़ में 1575 ई. से 1585 ई. तक 10 वर्षों में जो कुछ भी मुगलों ने जीता, वो लगभग सब महाराणा प्रताप ने मात्र एक वर्ष (1585-86 ई.) में मुगलों से छीन लिया

महाराणा प्रताप ने इस एक वर्ष में 36 मुगल थानों पर अधिकार किया

लेकिन जगन्नाथ कछवाहा ने जो मुगल थाने मुकर्रर किए थे, वे अभी भी मौजूद थे

* अगले भाग में महाराणा प्रताप द्वारा चावण्ड को मेवाड़ की नई राजधानी बनाने व चावण्ड में नवनिर्माण करवाने के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 84


विश्वासघाती किसान को मृत्युदण्ड देते महाराणा प्रताप

* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 148

1585 ई.

"आदेशों के उल्लंघन पर किसान को मृत्युदण्ड"

> ऊंठाळे की शाही फौज के किसी थानेदार ने वहां के एक विश्वासघाती किसान से किसी खास किस्म की तर्कारी बुवाई थी

किसान ने महाराणा प्रताप के आदेश का उल्लंघन किया

कविराज श्यामलदास लिखते हैं "महाराणा प्रताप ने रात के वक्त शाही फौज के बीच में जाकर उस किसान का सिर काट दिया | फौजी आदमियों के हमला करने पर महाराणा प्रताप उनसे लड़ते-भिड़ते पहाड़ियों में चले गए"

> इसी तरह की एक और घटना में महाराणा प्रताप ने मुगल फौज को फसल उगा कर देने वाले एक विश्वासघाती किसान को मृत्युदण्ड दिया व उसके शव को पेड़ पर लटका दिया गया

इन सख्त फैसलों के बाद महाराणा प्रताप के आदेशों का उल्लंघन नहीं हुआ

> कर्नल जेम्स टॉड लिखता है

"प्रताप ने मेवाड़ को रेगिस्तान (वीरान) बना दिया | जो भी समतल भूमि पर बसता, उसको प्रताप ने तलवार पर चढ़ा दिया | एक भयानक, परन्तु अनिवार्य बलिदान"

17 सितम्बर, 1585 ई.

"जगन्नाथ कछवाहा व महाराणा के बीच छापामार लड़ाईयां"

> जगन्नाथ कछवाहा ने महाराणा प्रताप के निवास स्थान चावण्ड पर हमला किया  व चावण्ड को लूट लिया, पर महाराणा प्रताप बच निकले

> महाराणा प्रताप अपने परिवार समेत चावण्ड से कुम्भलगढ़ पधारे व कुम्भलगढ़ के पास एक शाही थाने पर हमला कर दिया

सैयद राजू को इस हमले की खबर मिली, तो वो मांडलगढ़ से निकलकर महाराणा के पीछे गया

जगन्नाथ कछवाहा भी कुम्भलगढ़ पहुंचा, पर तब तक महाराणा प्रताप वहां से निकल चुके थे

> जगन्नाथ कछवाहा व सैयद राजू की फौजें मिल गईं व महाराणा प्रताप की खोज में जुट गईं

"महाराणा प्रताप की चित्तौड़ में कार्यवाही"

> महाराणा प्रताप ने चित्तौड़ की पहाड़ियों में प्रवेश किया

शाही फौज ने चित्तौड़ की पहाड़ियों में प्रवेश नहीं किया, हालांकि वे जानते थे कि महाराणा प्रताप चित्तौड़ में ही हैं | शाही फौज ने महाराणा के बाहर निकलने तक इन्तजार किया |

> चित्तौड़ पर इस वक्त मुगलों का अधिकार था और अकबर ने 1568 ई. में चित्तौड़ का नाम 'अकबराबाद' कर दिया था

> फिर भी महाराणा प्रताप ने वहां आम लोगों में एक हुक्म जारी करवा दिया कि "जो कोई भी चित्तौड़ को अकबराबाद के नाम से पुकारेगा, उसे मृत्युदण्ड दिया जावेगा"

> चित्तौड़ की प्रजा ने भी अकबराबाद नाम स्वीकार नहीं किया

> कुछ समय बाद चित्तौड़ की पहाड़ियों से निकलकर महाराणा प्रताप ने एक शाही थाने पर हमला कर दिया, जिससे सैयद राजू और जगन्नाथ कछवाहा की फौज का ध्यान फिर से महाराणा की तरफ गया

8 अक्टूबर, 1585 ई.

* अबुल फजल लिखता है "जगन्नाथ कछवाहा ने एक दफ़ा फिर राणा के डेरे पर हमला किया, पर राणा बच निकला | शाही फौज राणा के गुजरात जाने की अफवाह सुनते ही गुजरात के लिए निकली | बीच रास्ते में उन्हें खबर मिली की राणा ने डूंगरपुर के रावल साहसमल के साथ मिलकर बगावत कर दी | शाही फौज डूंगरपुर पहुंची, जहां राणा तो नहीं मिला, पर गद्दारी के एवज़ में साहसमल से भारी जुर्माना वसूला गया"

* महाराणा प्रताप ने गोडवाड़ में प्रवेश किया

* जगन्नाथ कछवाहा को रास्ते में जो भी मिलता, उससे वह महाराणा प्रताप के बारे में जरुर पूछता

आखिरकार 2 वर्षों की नाकामयाबी से थक-हारकर जगन्नाथ कछवाहा मेवाड़ में कईं थाने मुकर्रर कर कश्मीर अभियान में चला गया

(1608 ई. में जगन्नाथ कछवाहा महाराणा अमरसिंह के हमले से मारा गया, जिसका हाल महाराणा अमरसिंह के इतिहास में लिखा जाएगा)

* अगले भाग में महाराणा प्रताप के विजय अभियान व 36 मुगल थानों पर विजय के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 83



* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 147

1583 ई.


* महाराणा प्रताप का छापामार युद्धों में साथ देने वाले बेदला के बलभद्र सिंह चौहान का देहान्त हुआ

ये महाराणा प्रताप की एक रानी के भाई थे

1584 ई.

* महाराणा प्रताप का हल्दीघाटी युद्ध व छापामार युद्धों में साथ देने वाले देवगढ़ के रावत सांगा चुण्डावत व जवास के रावत बाघ सिंह का देहान्त हुआ

रावत चन्द्रभान जवास के शासक बने व महाराणा प्रताप का साथ दिया

* इसी वर्ष महाराणा प्रताप के पौत्र व कुंवर अमरसिंह के पुत्र भंवर कर्ण सिंह का जन्म हुआ

* इन्हीं दिनों महाराणा प्रताप मांडलगढ़ और चित्तौड़गढ़ दुर्ग के आसपास की समतल भूमि पर तैनात मुगलों पर हमले करने लगे

"महाराणा प्रताप के विरुद्ध अकबर के सेनापति जगन्नाथ कछवाहा का मेवाड़ अभियान"

* महाराणा प्रताप द्वारा दिवेर समेत कई मुगल थानों पर हमले और विजय के बारे में अबुल फजल लिखता है

"राणा की हरकतें बड़ी खतरनाक होती जा रही थीं | खबर आई कि राणा पहाड़ी की घाटियों में से निकल आया है और उसने फिर से कलह करना शुरु कर दिया है | वह कमजोरों पर जुल्म कर रहा था | शरारतियों को सज़ा देना खुदा की इबादत है, इस खातिर आमेर के जगन्नाथ कछवाहा को मुगल फौज की कमान और अजमेर का सूबा सौंपकर राणा को खदेड़ने भेजा गया | जफ़र बेग को बख्शी बनाया गया"

* जगन्नाथ कछवाहा :-

ये आमेर के भारमल्ल का बेटा व मानसिंह का काका था | हल्दीघाटी युद्ध में राजा रामशाह तोमर व रामदास राठौड़ की हत्या इसी ने की थी |
जगन्नाथ कछवाहा का मेवाड़ अभियान

5 दिसम्बर, 1584 ई.

* जगन्नाथ कछवाहा हजारों की मुगल फौज के साथ मेवाड़ आया

* जगन्नाथ कछवाहा के साथ आने वाले प्रमुख मुगल सिपहसालार :-

> सैयद राजू :- इसने हल्दीघाटी युद्ध में भी भाग लिया था

> मिर्जा जफ़र बेग :- इसे बख्शी बनाया गया

> वज़ीर ज़मील

> सैफ उल्लाह

> मुहम्मद खां

> जान मुहम्मद

> शेर बिहारी

* शाही फौज के मेवाड़ में आने की खबर सुनकर महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के आम लोगों में हुक्म जारी करवाया कि

"जो कोई भी एक बिस्वा ज़मीन भी जिराअत (खेती) करके मुगल फौज को हासिल देगा, उसका सर कलम कर दिया जावेगा"

* जगन्नाथ कछवाहा मांडलगढ़ पहुंचा

उसने मोही व मदारिया पर कब्जा किया

उसने मांडलगढ़ सैयद राजू को सौंप दिया व खुद महाराणा प्रताप की खोज में लग गया

* जगन्नाथ कछवाहा ने महाराणा प्रताप के निवास स्थान पर हमला किया, तो महाराणा प्रताप वो जगह छोड़कर निकले और बेहतरीन छापामार प्रणाली अपनाते हुए  दूसरी पहाड़ी से निकलकर हजारों की मुगल फौज पर अचानक आक्रमण कर दिया, जिससे जगन्नाथ कछवाहा बचने में कामयाब रहा, पर मुगल फौज को भारी क्षति हुई

इस घटना को अबुल फजल कुछ इस तरह लिखता है :-

"जगन्नाथ कछवाहा ने राणा के डेरे पर हमला किया, पर राणा अपने एक खैरख्वाह के इशारे से बचकर निकल गया | लगा जैसे राणा भाग गया, पर उसने अचानक दूसरी तरफ से पहाड़ियों से निकलकर शाही फौज पर जोरदार हमला किया, जिससे शाही फौज में हडकम्प मच गया | राणा हमला करने के बाद फिर पहाड़ियों में चला गया | इस तरह शाही फौज को यहां कोई जीत नसीब नहीं हुई"

* अगले भाग में जगन्नाथ कछवाहा व महाराणा प्रताप के बीच हुए छापामार युद्धों के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)