Saturday, 23 September 2017

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 75



* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 139

अक्टूबर, 1582 ई.

'विजयादशमी का दिन' 


"दिवेर का युद्ध"


* कर्नल जेम्स टॉड लिखता है

"प्रताप के शत्रु जब यह कल्पना कर रहे थे कि प्रताप रेगिस्तान में होकर पीछे हटने की तैयारी में है, उस वक्त प्रताप ने शाहबाज खां के ही शिविर दिवेर में जाकर सबको चौंका दिया और वहां के एक-एक सैनिक के टुकड़े-टुकड़े कर दिए"

* "मेवाड़ का मैराथन"

> कर्नल जेम्स टॉड ने जहां हल्दीघाटी युद्ध को 'मेवाड़ की थर्मोपल्ली' कहा, वहीं टॉड ने दिवेर युद्ध को 'मेवाड़ का मैराथन' कहा

> टॉड ने ये उदाहरण बड़ी चतुरता से दिया है, जिसके पीछे का इतिहास कुछ इस तरह है :-

यूनान के एक प्राचीन नगर का नाम मैराथन है, जहां 491 ई. पूर्व एक भयंकर युद्ध हुआ था | यह युद्ध ईरानियों की एक भारी सेना व यूनानियों की छोटी सी सेना के बीच हुआ था | ईरानियों की फौज लगभग 20,000 थी | ईरानी पूरे यूनान पर आधिपत्य स्थापित करना चाहते थे | यूनानियों ने आसपास की पहाड़ियों पर अपने सैनिक तैनात कर दिए | इस युद्ध में यूनानियों ने ऐसा जोर दिखाया कि ईरानियों के 6,400 सैनिक मारे गए, वहीं मात्र 192 यूनानी काम आए | इस शानदार विजय के बाद मैराथन का मैदान संसार भर में प्रसिद्ध हो गया |

"विजयादशमी के मौके को,
राणा ने तलवारें खींची |
चढ़ दिवेर की घाटी को,
मुगलों के रक्त से सींची ||"


* मनकियावास गांव -


महाराणा प्रताप ने दिवेर के युद्ध की रणनीति गोमती चौराहा से 3 किमी. व आमेट से 15 किमी. दूर मनकियावास के जंगलों में तैयार की | जंगली बिलावों की अधिकता के कारण इस गांव का नाम मनकियावास पड़ा | आत्मसुरक्षा के साथ ही आमेट, देवगढ़, रुपनगर व आसपास के ठिकानों से मदद पाने की नजर से भी यह स्थान उपयुक्त था | यहां से दिवेर की दूरी भी कम है | यहां बरगद के पेड़ के नीचे स्थित गुफा में रहते हुए महाराणा प्रताप गुप्त सुचनाएं एकत्रित करते थे |
मनकियावास गांव में स्थित महाराणा प्रताप की गुफा

* दिवेर युद्ध के कुछ वर्षों बाद लिखे गए अमरकाव्य नामक ग्रन्थ के अनुसार दिवेर युद्ध से पहले शकुनी नाम के किसी ज्योतिषि ने महाराणा प्रताप से कहा कि "प्रताप के भाले पर देवी अवस्थित है, अब प्रताप के हाथों शत्रु की पराजय निश्चित है"

* दिवेर राजसमन्द जिले में उदयपुर-अजमेर मार्ग पर स्थित है, जहां शाहबाज खां ने सुल्तान खां की कमान में बहुत बड़ा मुगल थाना लगा रखा था

इस युद्ध में मुगल फौज का नेतृत्व सुल्तान खां ने किया

सुल्तान खां अकबर का रिश्तेदार (संभवत: काका या मामा) था

महाराणा प्रताप ने मेवाड़ी सेना का नेतृत्व किया, लेकिन कुंवर अमरसिंह व भामाशाह को सेनापति बनाया

आमेट, चूडामण समेत कुल 14 शाही थानों व उनके थानेदारों ने मुगल फौज का साथ दिया

* अगले भाग में कुंवर अमरसिंह द्वारा सुल्तान खां वध व दिवेर विजय के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 74



* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 138

1581 ई.

"अकबर की काबुल विजय"


अकबर ने काबुल पर फतह पाई | इस विजय से अकबर को 1400 हाथी मिले |

"कुंवर अमरसिंह का विवाह"

साहबकंवर जी से कुंवर अमरसिंह का विवाह हुआ

साहबकंवर जी आगे चलकर मेवाड़ की महारानी बनीं

1582 ई.

"जैन आचार्य जिनभद्र सूरी"

> अकबर की जैन आचार्य जिनभद्र सूरी से भेंट हुई

अकबर ने हजारों शिकार किये थे लेकिन आचार्य से प्रभावित होकर उसने काफी हद तक शिकार करना बन्द किया

अकबर ने आचार्य को "जगत गुरु" की उपाधि दी

> महाराणा प्रताप को जब इस बात का पता चला, तो उन्होंने आचार्य जी को एक पत्र लिखा

इस पत्र में महाराणा ने लिखा कि आचार्य जी ने अकबर को उपदेश देकर जीवहिंसा रुकवाकर बड़ा उपकार किया है

पत्र में महाराणा प्रताप ने आचार्य जी से उदयपुर पधारने का भी आग्रह किया

"अकबर द्वारा दीन-ए-इलाही धर्म की स्थापना"

अकबर ने दीन-ए-इलाही धर्म की स्थापना की

प्रमुख लोगों में से इस धर्म के मात्र 18 अनुयायी बने, जिनमें बीरबल एकमात्र हिन्दु था

"मेवाड़ को स्वतंत्र करने की मुहिम"

इस समय चित्तौड़गढ़, मांडलगढ़, कुम्भलगढ़, भीमगढ़, मांडल, वागड़, दिवेर, उदयपुर, ओवरां, जावर, मोही, मदारिया, आमेट, देवगढ़, पिण्डवाड़ा, छप्पन, जहांजपुर, देसूरी, हमीरसर, गोगुन्दा, खेरवाड़ा, बिजौलिया, आसपुर समेत लगभग सम्पूर्ण मेवाड़ पर मुगल बादशाह अकबर का आधिपत्य स्थापित हो चुका था

महाराणा प्रताप ने 3 वर्षों (1579-82 ई.) तक मुगलों से मुकाबला तो किया, लेकिन इस दौरान सेना के अभाव में कोई बड़ी जंग नहीं हुई

महाराणा प्रताप ने इन 3 वर्षों तक ढोलन गांव को मुख्य केन्द्र बनाए रखा

इसके बाद महाराणा ने भामाशाह द्वारा दिये गए धन की सहायता से अपनी भरपूर ताकत से मेवाड़ को स्वतन्त्र करने की मुहिम शुरु की

इस पवित्र कार्य का शुभारम्भ करने के लिए महाराणा प्रताप ने विजयादशमी का दिन चुना

* अगले भाग में दिवेर युद्ध के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 73



* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 137

1581 ई.

"मृगेश्वर का ताम्रपत्र"


> महाराणा प्रताप ने मारवाड़ के मृगेश्वर नाम के एक गांव में तैनात मुगलों को मार-भगाकर अधिकार किया व यह गांव उसी समय ताम्रपत्र जारी करके दान कर दिया

> महाराणा प्रताप द्वारा जारी व भामाशाह द्वारा लिखित इस ताम्रपत्र में कुल 7 पंक्तियाँ अंकित हैं

> यह ताम्रपत्र फाल्गुन शुक्ला 5 (शनिवार) संवत् 1638 (1581 ई.) को जारी किया गया था

> ताम्रपत्र के अनुसार महाराणा प्रताप के आदेश से कान्हा सांदू नामक चारण कवि को मृगेश्वर नामक गांव प्रदान किया गया

> मृगेश्वर गांव गोडवाड़ (पाली-मारवाड़) क्षेत्र में स्थित है

> कान्हा सांदू चित्तौड़ के निकट हुम्प खेड़ी नामक गांव के निवासी थे

> कान्हा सांदू हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप के साथ थे व इस युद्ध का वर्णन इन्होंने अपने एक गीत में भी किया है

"कवि पानिपराव का बलिदान व केसरिया पगड़ी"

> इन्हीं दिनों एक चारण कवि पानिपराव मुगल बादशाह अकबर के दरबार में उपस्थित हुए

पानिपराव ने अपनी पगड़ी उतारी और उसे अपने हाथ में पकड़कर दूसरे हाथ से अकबर को सलाम किया

> अकबर ने इस गुस्ताखी का कारण पूछा तो पानिपराव ने कहा

"हुजूर, ये पगड़ी मेवाड़ के महाराणा प्रताप ने मेरे दोहों से प्रसन्न होकर मेरे सिर पर रखी है, जब उनका सिर आपके आगे अब तक नहीं झुका, तो भला मैं उनकी पगड़ी को कैसे लज्जित कर सकता हूँ"

> पानिपराव ने इतना कहकर भरे दरबार में खड़े राजपूत राजाओं को दो दोहे सुनाए

"कुलहीन भये, कुल मलेच्छ मिले, अपकीर्ति सुनात दिसांन दिसांनहिं |
देन लगे नवरोज नये, तजि नाम प्रथा सुकहावत खांनहिं ||

छोत लगी जु अकबर की, जितहि तित मेटि सके न महांनहिं |
पानिप राव कहे सब राजन, बन्दहु रान प्रताप की पांनहिं ||"

अर्थात्

"जो अपने वंश गौरव को विस्मृत करके मलेच्छ वंश में विलीन हो रहे हैं, जिसके कारण सभी दिशाओं में आपकी अपकीर्ति सुनाई दे रही है | वे तो नित्य नये प्रकार से नवरोजे दे रहे हैं और यहां तक कि वे अपने नाम की गौरवशाली परम्परा छोडकर स्वयं को खां कहलाने में गौरव समझ रहे हैं | अकबर के दुष्प्रभाव की छाया जहां तक दृष्टिगोचर हो रही है, जिसे बड़े-बड़े राजागण भी नहीं मिटा सके हैं | ऐसे समय में कवि पानिपराव सभी राजाओं से आव्हान करता है कि वे महाराणा प्रताप के पदत्राणों की पूजा करते हुए उनके मार्ग का अनुसरण करें"

> कवि पानिपराव को महाराणा प्रताप के प्रति इस असीम श्रद्धा की कीमत अपनी जान गंवाकर चुकानी पडी, क्योंकि अकबर ने उसी समय पानिपराव को मृत्युदण्ड दिया

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 72



* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 136

1580 ई.

"महाराणा प्रताप की बहन व बहनोई का देहान्त"


> मारवाड़ के राव चन्द्रसेन (महाराणा प्रताप के मित्र व बहनोई) की एक रानी सूरजदेवी थीं, जो कि महाराणा प्रताप की बहन थीं

रानी सूरजदेवी जी इन्हीं दिनों मथुरा यात्रा के लिए पधारीं, जहाँ उनका देहान्त हो गया

> राव चन्द्रसेन ने अजमेर के पर्वतीय भाग में लूटमार की

अकबर ने पयन्दा मुहम्मद खां, सैयद हाशिम, सैयद कासिम को भेजा, पर राव चन्द्रसेन पकड़ में नहीं आए

11 जनवरी, 1581 ई.

> भाद्राजूण में राव चन्द्रसेन के सामन्त वेरसल राठौड़ ने खाने में ज़हर मिलाकर राव चन्द्रसेन की हत्या कर दी

39 वर्ष की अल्पायु में राव चन्द्रसेन विश्वासघात की भेंट चढ़ गए

एक शानदार व यशस्वी जीवन का अन्त हुआ

राव चन्द्रसेन ने अपने स्वाभिमान को महत्व दिया व जंगलों में रहकर मुगलों से संघर्ष किया, इसलिए इन्हें "मारवाड़ का राणा प्रताप" भी कहा जाता है

"महाराणा प्रताप के मार्गदर्शन में सिरोही के राव सुरताण का मुगल विरोध"

> राव सुरताण देवड़ा के बड़े बेटे ने अकबर के एक सिपहसालार सैयद हुसैन की हत्या कर दी
राव सुरताण देवड़ा

> अकबर ने सैयद हुसैन की हत्या का बदला लेने के लिए जगमाल (महाराणा प्रताप के भाई) को सिरोही का राजतिलक व मुगल फौज की कमान सौंपकर सिरोही पर कब्जा करने भेजा

अकबर ने जालौर के एतमाद खां को भी जगमाल के साथ भेजा

जगमाल ने सिरोही पर हमला कर राव सुरताण को पहाड़ियों में जाने को विवश कर दिया

जगमाल ने सिरोही पर कब्जा कर लिया

एतमाद खां जगमाल की मदद के लिए गजनी खां, महमूद खां जालौरी, बिजा देवड़ा व रायसिंह राठौड़ (राव चन्द्रसेन के पुत्र) को सिरोही छोड़कर खुद जालौर चला गया

इससे जगमाल व राव सुरताण की शत्रुता हो गई, जो दो वर्ष बाद "दत्ताणी के युद्ध" में समाप्त हुई, जिसका हाल मौके पर लिखा जाएगा

> अगले भाग में दिवेर युद्ध से पूर्व की घटनायें लिखी जायेंगी

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 71



* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 135

1580 ई.


"अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना का मेवाड़ अभियान"

* महाराणा प्रताप द्वारा मालवा में की गई लूटमार के बाद अकबर ने अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना को मालवा भेजा

"अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना"

ये अकबर के संरक्षक बैरम खां का बेटा था | ये दिल का नेक इन्सान था | इसको कृष्ण भक्त कवि रहीम के रुप में भी जाना जाता है | ये अकबर के नवरत्नों में से एक था | अकबर ने बैरम खां की विधवा बेगम सलीमा सुल्तान से निकाह किया था | इस तरह रहीम अकबर का भी बेटा था |

"रहीम की भामाशाह से भेंट"

* मालवा में रहीम की भेंट भामाशाह कावडिया से हुई

रहीम ने भामाशाह से कहा कि अब महाराणा प्रताप को शहंशाह अकबर की अधीनता स्वीकार कर लेनी चाहिये, पर भामाशाह ने इनकार किया

"कुंवर अमरसिंह की शेरपुर विजय"

* रहीम ने शेरपुर में अपने परिवार व सेना सहित पड़ाव डाला

* रहीम अपने परिवार को एक फौजी टुकड़ी की निगरानी में रखकर खुद फौज समेत महाराणा प्रताप के पीछे गया

* इस वक्त कुंवर अमरसिंह गोगुन्दा में थे

कुंवर अमरसिंह को जब इस बात का पता चला, तो उन्होंने रहीम का ध्यान महाराणा से हटाने के लिए शेरपुर पर हमला कर दिया

कुंवर अमरसिंह शाही फौजी टुकड़ी को पराजित करके रहीम की बेगमों को बन्दी बनाकर महाराणा प्रताप के समक्ष प्रस्तुत हुए

इन बेगमों में से दो के नाम ज़ीनत व आनी बेगम है

महाराणा प्रताप ने कुंवर अमरसिंह को जोरदार फटकार लगाते हुए रहीम की बेगमों को सुरक्षित रहीम तक पहुंचाने का आदेश दिया

"रहीम का पश्चाताप"

* आनी बेगम ने रहीम को सारी घटना बताई
आनी बेगम रहीम को घटना बताती हुई

* रहीम जब सीकरी पहुंचा, तो उसने अपने पद से इस्तीफा दिया और सलीम (जहांगीर) के अर्तालीक (शिक्षक) के पद पर नियुक्त हुआ

* आगरा पहुंचकर रहीम ने महाराणा प्रताप के लिए ये पंक्तियाँ लिखीं, जो आज हर राजपूत की जुबान पर होती है और आज भी उदयपुर के राजचिन्ह में अंकित है :-

"जो दृढ़ राखै धर्म को, तिंही राखै करतार |
इण मन्त्र रो जाप करे, वो मेवाड़ी सरदार ||"


* रहीम ने महाराणा प्रताप के लिए लिखा - "इस संसार में सभी नाशवान है, परन्तु महान व्यक्तियों की ख्याति कभी नष्ट नहीं हो सकती | प्रताप ने धन और भूमि को छोड़ दिया, परन्तु उसने कभी अपना सिर नहीं झुकाया | हिन्द के राजाओं में वो एक ही है, जिसने अपनी जाति के गौरव को बनाए रखा है |"

* हालांकि रहीम ने कुछ समय बाद फिर से अपने पहले वाले पद को स्वीकार किया व इस घटना के 5 वर्ष बाद 1585 ई. में अकबर के आदेश पर दोबारा महाराणा के खिलाफ मेवाड़ अभियान का नेतृत्व किया, जिसका हाल मौके पर लिखा जाएगा

* अगले भाग में दिवेर युद्ध से पूर्व की विभिन्न घटनाओं के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 70



* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 134

1580 ई.

"ताराचन्द को गोडवाड़ व सादड़ी की जिम्मेदारी सौंपना"


> महाराणा प्रताप ने गोडवाड़ पर अधिकार कर वहां का उत्तरदायित्व भामाशाह कावडिया के भाई ताराचन्द कावडिया को सौंपा

> महाराणा प्रताप ने ताराचन्द को सादड़ी का हाकिम भी बना दिया

"ताराचन्द का ज़ख्मी होना"

महाराणा प्रताप ने मालवा को लूटने के लिए ताराचन्द को मालवा में रामपुरा की तरफ भेजा

मालवा में बस्सी नामक स्थान पर ताराचन्द का मुकाबला मुगल सेनापति शाहबाज खां से हो गया

ताराचन्द घोड़े से गिर गए व बुरी तरह ज़ख्मी हो गए

बस्सी के राव साईंदास देवड़ा ताराचन्द को अपने घर ले गए व उनका उपचार किया

"महाराणा प्रताप द्वारा मालवा में कार्यवाही व ताराचन्द की जीवनरक्षा"

महाराणा प्रताप को जब ताराचन्द के ज़ख्मी होने का पता चला, तो उन्होंने थोड़े बहोत सैनिकों के साथ फौरन मालवा कूच किया

मालवा पर मुगलों का अधिकार था, जिस वजह से महाराणा प्रताप का वहां जाना लगभग असम्भव था

पर महाराणा प्रताप ताराचन्द तक पहुंचने में सफल हुए और मालवा से निकले

मालवा से मेवाड़ के रास्ते में जितने भी मुगल थाने आए, महाराणा प्रताप ने उनको न सिर्फ हटाया, बल्कि मालवा के सबसे बड़े शाही थाने दशोर (वर्तमान में मन्दसौर) को लूटकर तहस-नहस करते हुए ताराचन्द को सुरक्षित चावण्ड ले आए

"रहीम का महाराणा के विरुद्ध कूच करना"
महाराणा प्रताप द्वारा की गई इस लूटमार के बाद अकबर ने अपने नवरत्नों में से एक व बैरम खां के बेटे अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना को मालवा भेजा

* अगले भाग में अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना के असफल मेवाड़ अभियान के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)

महाराणा प्रताप (राणा कीका) के इतिहास का भाग - 69



* मेवाड़ के इतिहास का भाग - 133

"महाराणा प्रताप का सलूम्बर पर अधिकार"


> महाराणा प्रताप ने रावत कृष्णदास चुण्डावत को बम्बोरा की जागीर दी

> महाराणा प्रताप ने रावत चुण्डावत को सलूम्बर पर अधिकार करने भेजा

भोमिये सिंहा राठौड़ ने सलूम्बर के शासक को धोखे से जहर देकर मार दिया था व इस वक्त सलूम्बर की गद्दी पर बेखटके राज कर रहा था

रावत चुण्डावत ने कानोड़ रावत सारंगदेवोत के साथ मिलकर सिंहा राठौड़ को जहर देकर मरवा दिया और सलूम्बर पर कब्जा किया

1580 ई.

"बांसवाड़ा रावल प्रताप सिंह की मृत्यु"

इस वर्ष बांसवाड़ा रावल प्रताप सिंह का देहान्त हुआ

बांसवाड़ा पर इस समय महाराणा प्रताप का अधिकार था, पर मुगलों से लड़ाईंयों में व्यस्त रहने के कारण उन्होंने इस समय बांसवाड़ा के उत्तराधिकार में हस्तक्षेप नहीं किया

रावल प्रताप सिंह के कोई पुत्र नहीं था, तब बांसवाड़ा के सर्दार मानसिंह चौहान ने रावल प्रताप सिंह के दासीपुत्र मानसिंह को रावल की उपाधि देकर बांसवाड़ा का मालिक बना दिया

मानसिंह चौहान की मदद से रावल मानसिंह बांसवाड़ा पर राज करने लगा

"डूंगरपुर पर महाराणा प्रताप का अधिकार"

इस वर्ष डूंगरपुर रावल आसकरण की मृत्यु हुई

महाराणा प्रताप ने रावल आसकरण के पुत्र साहसमल को डूंगरपुर की राजगद्दी पर बिठाया

साहसमल ने महाराणा की अधीनता स्वीकार कर रखी थी, इसलिए डूंगरपुर महाराणा प्रताप के अधीन हुआ

महारावल आसकरण की रानियों में चौहान वंश की महारानी प्रेमलदेवी के पुत्र साहसमल थे | कईं जगह इनका नाम सैंसमल भी लिखा है | साहसमल ने महाराणा प्रताप का भरपूर साथ दिया |

* अगले भाग में महाराणा प्रताप द्वारा मालवा के मुगल थानों में लूटमार व ताराचन्द कावडिया की जीवन रक्षा के बारे में लिखा जाएगा

:- तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा (बाठरड़ा-मेवाड़)